आइए जानें इसकी उन्नत खेती के बारे में


गेंदा की खेती हमारे देश में लगभग हर क्षेत्र में की जाती हैयह बहुत महत्तवपूर्ण फूल की फसलक्योंकि इसका उपयोग व्यापक रूप से धार्मिक और सामाजिक कार्यों में किया जाता हैगेंदे की खेती व्यवसायिक रूप से केरोटीन पिगमेंट प्राप्त करने के लि भी की जाती हैइसका उपयोग विभिन्न खाद्य पदार्थों में पीले रंग के लिए किया जाता हैगेंदा के फूल से प्राप्त तेल का उपयो इत्र तथा अन्य सौन्दर्य प्रसाधन बनाने में किया जाता हैसाथ ही यह औषधीय गुण के रूप में पहचान रखता हैकुछ फसलों में कीटों के प्रकोप को कम करने के लि फसलों के बीच में इसके कुछ पौधों को लगाया जाता है|
 
कम समय के साथ कम लागत की फसल होने के कारण यह काफी लोकप्रिय फस बन गई हैगेंदा के फूल आकार और रंग में आकर्षक होते हैंइसकी खेती आसान होने के कारण इसे व्यापक रूप से अपनाया जा रहा हैआकार और रंग के आधार पर इसकी दो किस्में होती हैंअफ्रीकी गेंदा और फ्रैंच गेंदाइसके प्रमु उत्पादक राज्य महांराष्ट्रर्नाटकगुजरातआंध्रा प्रदेश, तामिलनाडू और मध्य प्रदेश हैयदि उत्पादक बंधु गेंदा की खेती वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर करेंतो इसकी फसल से उत्तम उत्पादन प्राप्त किया जा सकता हैइस लेख में गेंदा की उन्नत खेती कैसे करें की विस्तृत जानकारी का उल्लेख किया गया है|
 
उपयुक्त जलवायु
 
अफ्रीकन एवं फ्रेंच गेंदा की खेती वर्ष भर की जाती हैइनका विभिन्न समय पर पौध रोपण करने पर लगभग वर्ष भर पुष्पोत्पादन मिलता रहता हैखुला स्थान जहाँ  सूर्य की रोशनी सुबह से शाम  रहती होऐसे स्थानों पर गेंदा की खेती सफलतापूर्वक की जा कती हैछायादार स्थानों पर इसके पुष्प उत्पादन की उपज बहुत कम हो जाती हैं तथा गुणवत्ता भी घट जाती हैशीतोष्ण जलवायु को छोड़कर अन्य जलवायु में इसकी खेती लगभग वर्ष भर की जा सकती हैशीतोष्ण जलवायु में इसका पुष्पोत्पादन केवल गर्मी के मौसम में किया जा सकता है|
भूमि का चयन
 
गेंदा की खेती वैसे तो हर प्रका की भूमि में की जा सकती हैरन्तु भरपूर उपज के लिए जीवांशयुक्त उपजाऊ दोमट मिट्टी जिसका पी एच मान 6.0 से 6.8 के मध्य होअधिक उपयुक्त रहती हैखेत में जलन निकास का उचित प्रबंध होना भी नितांत आवश्यक है|
 
खेत की तैयारी
 
गेंदा की खेती के लिए पौध की रोपाई के लगभग 15 दिन पहले भूमि की मिट्टी पलटने वाले हल से दो से तीन बार अच्छी तरह जुताई कर ले तथा मिट्टी में 30 टन प्रति हैक्टेयर की दर से अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद मिला देनी चाहिएक्यारीयों की चौड़ाई एवं लम्बाई सिंचाई के साधन एवं खेत के आका पर निर्भर करती हैखेत समतल होने पर क्यारीयां लम्बी एवं चौड़ी बनानी चाहिएलेकिन खेत नीच ऊंच होने पर क्यारी का आकार छोटा रखना चाहिएलेकिन दो क्यारियों के बीच में 1 से 1.5 फीट चौड़ा मेड़ रखनी चाहिए|
 
उन्नत प्रजातियाँ
 
गेंदा पुष्प उत्पादन के दृष्टिकोण से अफ्रिकन गेंदा और फ्रेंच गेंदा दो प्रकार की किस्में प्रचलित हैजैसे-
 
अफ्रिकन गेंदाअफ्रिकन गेंदे के पौधे 90 से 95 सेंटीमीटर तक लम्बे तथा बड़ी-बड़ी शाखाओं वाले होते हैफूलों का रंग पीलासुनहरा पीलानारंगी आदि होता है| इसकी प्रचलित व्यवसायिक किस्में इस प्रकार हैजैसे-
बड़े फूलों वालीपूसा नारंगी गेंदापूसा वसन्ती गेंदापूसा बहायलो सुप्रीमक्लाईमैक्सजीनिया गोल्डगोल्ड काँचनसन जाइंट समाइलस और मैन इन दी मून आदि प्रमुख है|
 
मध्यम आकार के फूलों वालीजुवलो सीरिजहैप्पी फेसगोल्ड जैलोट और लोडी आदि प्रमुख है|
छोटे आकार के फूलों वालीस्पेस राज सीरिजअपोलो मून शोटमैरीनेटजिरेंकगोल्डन रेस्पन पीलाक्यूपिडहैप्पीनेस और डोली आदि प्रमुख है|
 
फ्रेंच गेंदाफ्रेंच गेंदे के पौधे अफ्रिकन गेंदे की अपेक्षा छोटे होते हैंइस प्रजाती के पौधे की वृद्धि तीव्र गति से होती हैइस कारण यह फसल अफ्रिकन गेंदे की अपेक्षा शीघ्र तैयार हो जाती हैफ्रेंच गेंदे के फूल विभिन्न आकर्षक रंगो जैसे पीलासंतरीभूरामहारानीदोरंगा तथा कई रंगो के मिश्रण आदि में पाए जाते हैफ्रेंच गेंदे की किस्मों को पौधों की ऊँचाई के आधार पर विभक्त किया जाता हैजैसे-
छोटे पौधे वालीपूसा अर्पिताफ्लैमफ्लेमिंग फायर डबल और रस्टी रैड आदि प्रमुख है|
 
सबसे छोटे पौधे वालीइस वर्ग में पिटाइट सीरिज की किस्में जो आमतौर पर 15 सेंटीमीटर तक बढ़ती हैजैसेगोल्डजिप्सीओरेंज फ्लैडैन्टी मरीटास्टार ऑफ इण्डिया  टीना में इकहेर फूल आते है|
 
एफ 1 हाइब्रिडअपोलोक्लाइमैक्सफस्ट लेडीगोल्ड लेडीओरें लेड़ीइन्का येलोइन्का गोल्ड और इन्का ओरेंज आदि प्रमुख है|
गेंदा का प्रवर्धन
 
गेंदा का प्रवर्धन बीज तथा वानस्पतिक भाग शाखा से कलम विधि द्वारा किया जाता हैवानस्पतिक विधि द्वारा प्रवर्धन करने से पौधे पैतृक जैसे ही उत्पादित होते हैंव्यवसायिक स्तर पर गेंदा का प्रवर्धन बीज द्वारा किया जाता हैइसका 800 ग्राम से 1 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से लगता हैगेंदा का प्रवर्धन कलम विधि द्वारा करने के लिए 6 से 8 सेंटीमीटर लम्बी कलम पौधे के उपरी भाग से लेते हैं|
 
पौधे से कलम को अलग करने के उपरान्त कलम के निचले हिस्से से 3 से 4 सेंटीमीटर तक की सभी पत्तियों को ब्लेड से काट देते हैं तथा कलम के निचले भाग को तिरछा काटते हैंइसके बाद कलम को बालू में 2 से 3 सेंटीमीटर गहराई पर लगा देते हैं। कलम को बालू में लगा देने के 20 से 25 दिन बाद लम में जड़ें बन जाती हैंइस प्रकार वानस्पतिक प्रवर्धन विधि से पौधा बन कर रोपण हेतु तैयार हो जाता है|
बुवाई का समय
 
गर्मी के मौसम का गेंदा पुष्पोत्पादन करने हेतु फरवरी माह के दूसरे सप्ताह तथा वर्षा ऋतु के समय पुष्पोत्पादन हेतु जून के हले सप्ताह में बीज की बुवाई करनी चाहिएसर्दी के मौसम का पुष्पोत्पादन हेतु सितम्बर माह के दूसरे सप्ताह में बीज की बुवाई करनी चाहिएनर्सरी में बीज की बुवाई के एक माह बाद पौध रोपण हेतु तैयार हो जाती है|
 
नर्सरी तैयार करना
 
गेंदा की पौध तैयार करने के लिए सामान्य तौर पर 1 मीटर चौड़ा था 15 से 20 सेंटीमीटर जमीन को सतह से ऊंची क्यारी बनाते हैंदो क्यारियों के बीच में 30 से 40 सेंटीमीटर का फासला छोड़ देते हैंजिससे सुगमतापूर्वक नर्सरी में खरपतवार निकाई तथा क्यारी से पौधों को रोपण हेतु निकाला जा सके नर्सरी की क्यारी की मिट्टी अच्छी तरह भुरभुरी करके मिट्टी में सड़ी हुई गोबर की खा 10 से 12 किलोग्राम प्रति वर्गमीटर के दर से मिला देते हैं|
 
यदि बलुई दोमट मिट्टी  हो तो क्यारी में आवश्यकतानुसार बालू की मात्रा भी मिला देते हैंक्यारी में बीज की बुवाई से पहले 2 ग्राम कैप्टान प्रति लीटर पानी में घोल कर सभी क्यारियों में डेंच कर देना चाहिएइससे नर्सरी में कवक का प्रकोप कम हो जाता हैजिसके कारण बीज के अंकुरण के बा पौधों की मृत्यु दर कम हो जाती हैक्यारी में बीज की बुवाई दो पंक्तियों के बीच में 6 से सेंटीमीटर का फासला रखते हुए 1.5 से 2 सेंटीमीटर की गहराई पर करनी चाहिए|
पंक्तियों में बीज पास-पास नहीं रखना चाहिए क्योंकि पास-पास बी की बुवाई करने से पौध कमजोर हो जाती हैजिससे पुष्प उत्पादन भी कम होता हैबीज की बुवाई के बाद सड़ी पत्ती की खाद या बालू की पतली परत क्यारी के उपर बिछा देना चाहिएऐसा करने से क्यारी में नमी बनी रहती है और बी का अंकुरण भी अधिक होता हैक्यारियों में गर्मी के मौसम में सुबह-शाम तथा सर्दी एवं बरसात के मौसम में सुबह पानी प्रतिदिन फुहारा से देना चाहिए|
पौध रोपण
 
नर्सरी में गेंदा बीज की बुवाई के एक माह बाद पौध रोपण हेतु तैयार हो जाती हैअफ्रीकन गेंदा 40 x 40 सेंटीमीटर तथा फ्रेंच 30 x 30 सेंटीमीटर पौध से पौध एवं पंक्ति से पंक्ति के फांसले पर तथा 4 से 5 सेंटीमीटर गहराई पर रोपना चाहिएपौध रोपण गर्मी के मौसम में सांयकाल तथा सर्दी एवं रसात में पूरे दिन किया जा सकता हैपौध रोपण के समय यदि पौध म्बा हो गया हो तो लगाने से पहले उसका शीर्षनोचन कर देना चाहिए|
 
खाद एवं उर्वरक
 
गोबर की सड़ी खाद 250 से 300 क्विंटल प्रति हैक्टेयर की दर से डालना चाहिएइसके अतिरिक्त रासायनिक उर्वरकों द्वारा 200 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर नत्रजन और 80 किलोग्राम फास्फोरस एवं 80 किलोग्राम पोटाश देने से पुष्पोत्पादन बढ़ जाता हैफास्फोरस एवं पोटाश को पूरी मात्रा हेतु सिंगल सुपरफास्फेट तथा म्यूरेट आफ पोटाश को क्यारियों की तैयारी के समय मिट्टी में मिला देना चाहिएनत्रजन की मात्रा को तीन बराबर भाग में बांट कर एक भा क्यारीयों की तैयारी के समय वं दो भाग पौध रोपण से 30 एवं 50 दिन पर यूरिया या कॅल्शियम मोनियम नाइट्रेट उर्वरक द्वारा देना चाहिए|
 
सिंचाई प्रबंधन
 
गेंदा की खेती में पौधों की बढ़वार एवं पुष्पोत्पादन में सिंचा का विशेष महत्व हैसिंचाई के पानी का पी एच मान 6.5 से 7.5 तक लाभकारी पाया गया हैपौध रोपण के तुरन्त बाद सिंचाई खुली नाली विधि से की जाती हैमृदा में अच्छी नमी होने से जड़ों की अच्छी वृद्धि एवं विकास होता है और पौधों को मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्व उचित मात्रा में मिलता रहता हैशुष्क मौसम में सिंचाई पर विशेष ध्यान देना चाहिएगर्मी में 5 से 6 दिन तथा सर्दी में से 10 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिएक्यारियों में पानी का जमाव नहीं होना चाहिएबरसात में अत्याधिक पानी की निकासी के लिए जल निकास नाली पहले से तैयार रखनी चाहिए|
 
खरपतवार नियंत्रण
 
खरपतवार जब छोटा रहे उसी समय खे से बाहर निकाल देना चाहिएगेंदा फसल की छोटी अवस्था में समय पर गुड़ाई करनी चाहिएऐसा करने से मिट्टी भुरभुरी बनी रहती हैं और जड़ों की अच्छी वृद्धि एवं विकास होता हैमिट्टी की गुड़ा बहुत गहरी नहीं करनी चाहिए|
शीर्षनोचन
 
प्रथमशीर्षनोचन पौधा की फैलाव को बढ़ाने के लिए किया जाता हैशीर्षनोचन दो बार करने से पुष्पोत्पादन बढ़ जाता हैंयदि पौ रोपण बिलम्ब से किया गया हो तो केवल प्रथम शीर्षनोचन करना चाहिएप्रथम पौध रोपण के समय यदि पौधों का शीर्षनोचन  किया गया हो तो पौध लगाने के 12 से 15 दि बाद उन प्रत्येक पौधा का शीर्षनोचन हाथ से करना चाहिए|
 
जिनकी लम्बाई जमीन की सतह से 15 सेंटीमीटर से अधिक हो गयी होशीर्षनोचन के समय यह ध्यान रखा जाता हैकि शीर्षनोचन के उपरान्त पौध पर 4 से 5 पूर्ण विकसित पत्तियाँ बनी रहेंऐसा करने से एक पौध पर 3 से 5 तक मुख्य शाखाएं  जाती हैंशाखाओं की संख्या बढ़ने पर पुष्पोत्पादन बढ़ जाता है|
 
द्वितीयप्रथम शीर्षनोचन जैसा ही द्वितीय शीर्षनोचन करते हैं| इसमें मुख्य शाखाएं जब 15 से 20 सेंटीमीटर लम्बी हो जाती हैंउस समय हर शाखा पर 4 से 5 पूर्ण विकसित पत्तियों छोड़कर शीर्षनोचन कर देते हैं|
 
कीट एवं रोकथाम
 
रेड स्पाइडर माइटमाइट गेंदा की पत्तियों का रस चूस लेते हैंजिससे पत्तियाँ हरे रंग से भूरे रंग में बदलने लगती हैं और पौधों की बढ़वार बिल्कुल रुक जाती हैइसका अत्याधिक प्रकोप होने पर पुष्पोत्पादन भी नहीं हो पाताजो कलियां बनती भी हैंवह खिल भी नहीं पाती हैं|
 
रोकथामइसकी रोकथाम के लिए हिल्फोल 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए|
 
एफिड्सएफिड्स रस चूसने वाला की हैइनका प्रकोप गेंदा फसल की पत्तियोंटहनियों एवं पुष्प लियों पर होता हैयह पौधे की वृद्धि को कम कर देता है|
 
रोकथामइसकी रोकथाम के लिए मैलाथियान या इण्डोसल्फान का छिड़काव 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर करना चाहिए|
 
लीफमाइनरलीफमाइनर नर एवं मादा दोनों गेंदा फसल को नुकसान पहुंचाते हैंगेंदा में इसका प्रको होने पर पत्तियों में सफेद धारियां बन जाती हैं और पौधों की बढ़वार कम हो जाती है|
 
रोकथामइसकी रोकथाम के लिए 1.से 2 मिलीलीटर इण्डोसल्फान प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए|
 
कैटरपिलरकैटरपिलर हरा एवं भूरा काले रंग का कीट हैयह गेंदा फसल की पत्तियोंटहनियों एवं कलियों को नुकसान पहुंचाते हैं|
 
रोकथामइसकी रोकथाम के लिए 1.मिलीलीटर इण्डोसल्फान या मैलाथियान एक लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए|
रोग एवं रोकथाम
 
डैमपिंग आफयह बीमारी राइजोकटोनिया सोलेनाई कवक का प्रकोप होने पर नर्सरी में होती हैंइस बीमारी का प्रकोप होने पर नर्सरी में ही पौधों की मृत्यु हो जाती हैंअधिकतर यह बीमारी नर्सरी में पौधों को बहुत अधिक पानी देने के कारण होती है|
 
रोकथामइसकी रोकथाम के लिए क्यारीयों में बीज की बुवाई करने से पहले क्यारी में किसी भी कापर कवकनाशी (कैप्टानका घोल (2.2 प्रतिशत सान्द्रताका ड्रे करना चाहिए या मिट्टी को फार्मल्डीहाइड नामक रसायन के घोल (प्रतिशत सान्दतासे संक्रमित कर देना चाहिएइस बीमारी का प्रकोप होने के बाद निदान करना बहु ही कठिन है|
 
फ्लावर बड़-रॉटयह बीमारी अधिक आर्द्रता वाले क्षेत्रों में देखी गई हैइस बीमारी से गेंदा सल की कलियों पर ब्राउन धब्बे ड़ जाते हैंइस प्रकार की कलियाँ पूर्ण रूप से खिल नहीं पाती हैं|
 
रोकथामइसकी रोकथाम के लिए डाइथेन एम- 45 का.2.2 प्रतिशत सान्द्रता के घोल का छिड़काव करना चाहिए|
 
कालर रॉटफूट रॉट एवं रूट रॉट- यह बीमारियों राइजोकटोनिया सोलेनाई , फाइटोप्थोरा स्पेशीजपीथियम स्पेशीज़इत्यादि कवकों के कारण होती हैकालर राट गेंदा फसल में किसी अवस्था में देखा जा सकता हैफूट रॉट एवं रूट रॉट अधिक आर्द्रता वाले क्षेत्र में तथा क्यारी में अधिक पानी होने के कारण भी होता है|
 
रोकथामइसकी रोकथाम के लिए नर्सरी की मिट्टी को बीज की बुवाई से पहले फार्मल्डीहाइड की घोल से संक्रमित करेंरोग रहित बीज का प्रयोग करेंरोगग्रसित पौधों को उखाड़ देंबहुत घना नर्सरी या पौध रोपण  करें तथा बुवाई से पहले कैप्टान से बीज को उपचारि करें|
 
लीफ स्पाटयह बीमारी अल्टरनेरिया टॅजेटिका कवक के प्रकोप होने पर गेंदा के पौधों पर देखि गई हैइस बीमारी से प्रभावित पौधों के पत्तियों के ऊपर भूरा गोल ब्बा दिखने लगता हैजो धीरे-धीरे पौधों की पत्तियों को खराब  देता है|
 
रोकथामइस बीमारी की रोकथाम के लिए बाविस्टीन 1 से 1.5 ग्राम पाउडर प्रति लीटर पानी में घोलकर पौधों पर छिड़काव करना चाहि|
 
पाउडरी मिल्ड्यूगेंदा में पाउडरी मिल्ड्यू ओडियम स्पेशीज और लेविल्लुला टैरिका कवकों के प्रकोप होने के कारण होता हैइस बीमारी में पौधों के पत्तियों के उपर सफेद पाउडर दिखाई देने लगता हैंकुछ समय बाद पूरे पौधे पर सफेद पाउडर दिखने लगता है|
 
रोकथामइसकी रोकथाम के लिए कैराथेन 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए|
 
विषाणु रोगविषाणु पौधों की गुणवत्ता को धीरे धीरे कम कर देते हैंगेंदा में कुकुम्बर मोजैक वाइरस का प्रकोप भी देखा गया है|
 
रोकथामविषाणु रोग के बचाव के लिए रोगग्रसित पौधों को समय-समय पर उखाड़ कर जमीन के अन्दर दबा दें या जला देना चाहिए|
पुष्पों की तुड़ाई
 
गर्मी के मौसम की फसल मई माह के मध्य से शुरु होकर बरसात के सम तक चलती हैलेकिन यह देखा गया है कि जून में सर्वाधिक पुष्प उत्पादन होता हैबरसात के मौसम की फसल में फूलों का उत्पादन सितम्बर मध्य से शुरु होकर लगातार दिसम्बर तक तथा सर्दी के मौसम की फसल जनवरी मध्य से शुरु होकर मार्च तक लगातार पुष्पोत्पादन होता रहता है|
 
पहाड़ी क्षेत्रों में गर्मी एवं बरसात की फसल सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैपुष्पों को पौध से तब अलग करते हैंजब पुष्प पूर्ण रूप से खिल जाएफूलों को तोड़ते समय यह ध्यान रखा जाता हैंकि पुष्प के नीचे लगभग 0.5 सेंटीमीटर तक लम्बा हरा डण्ठल पुष् से जुड़ा रहेपुष्यों की तुड़ाई सुबह के समय करना चाहिए तथा किसी ठण्डे स्थान पर रखना चाहि|
 
यदि पुष्प के ऊपर अतिरिक्त नमी या पानी की बूंद हो तो उसे छायादार स्थान पर फैला देना चाहिएनमी कम हो जाने के बाद बांस की टोकरी में बाजार में भेज दिया जाता हैफूलों को अतिरिक्त नमी के साथ पैक करने पर पुष्प की पंखुड़ियाँ काली पड़ने लगती हैंइसी कारण ऐसे फूलों की कीमत बाजार में बहुत कम मिलती हैं|
 
पैदावार
 
यदि उपरोक्त वैज्ञानिक विधि और सही तरीके से गेंदे की फसल पर ध्या दिया गया हो तो अफ्रीकन गेंदा 200 से 300 क्विंटल तथा फ्रेंच गेंदा से 125 से 200 क्विंटल  हाइब्रिड से 350 क्विंटल से धिक प्रति हैक्टेयर पुष्प की उप प्राप्त होती है|
 
 
 
गेंदे के पौधे कैसे तैयार करें?
गेंदा भारत में बहुत प्रचलित फू हैहर मौके पर इस्तेमाल होने के कारण इसने सजावटी फूलों में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया हैभारत में फूल व्यवसाय में गेंदे का स्थान महत्त्वपूर्ण हो गया हैक्योंकि इसका धार्मिक और सामाजिक अवसरों पर बहुत उपयोग होता है|
 
गेंदे की सबसे बड़ी विशेषता यह हैकि यह लगभग पूरे वर्ष फूल देता रहता हैजिन महीनों में कोई अन्य फूल नहीं मिलते हैउन दिनों भी गेंदे का फूल सहज उपलब्ध रहता हैअतः गेंदे की लोकप्रियता का कारण इसकी सहज उपलब्धता भी हैगेंदे के फूल कई दिनों  ताजा भी बने रहते हैं|
गेंदा भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लोकप्रिय तथा सभी स्थानों पर पाया जाने वाला फूल हैयह सर्वप्रथम हमारे देश में अग्रजों द्वारा लाया गयाजबकि इसका उत्पति स्थान मेक्सिको और दक्षिणी अमेरिका हैंगेंदे की विशेषता यह हैकि यह हर प्रका की जलवायु के प्रति सहनशीलम्बे समय तक फूलने वालाअधिक पज देने वाला तथा अनेक रंगों में पाया जाता है|
इसका अत्यधिक प्रयोग धार्मिक  सामाजिक उत्सवों खासकर रंगोलीब्याह-शादियों में मण्डप तैयार करने और माला आदि में होता है|
गेंदे का प्रवर्धन या पौध प्रसारण
आमतौर पर गेंदे को बीज द्वारा गाया जाता हैपरन्तु इसे कलमों द्वारा भी प्रवर्धित किया जा कता हैभारत में इसकी बुआई जलवायु की भिन्नता के अनुसार अलग-अल होती हैदक्षिण भारत में इसे मई के महीने में बोया जाता है, जिनसे अगस्त से अक्टूबर तक फूल मिलते रहते हैंयदि इसके बाद फूल लिए जाएं तो वे आकार में छोटे रह जाते हैं|
असमबिहारपश्चिमी बंगालऔर उड़ीसा में बीज फरवरी से जून एवं सितम्बर से अक्टूबर में बोये जाते हैंजिनसे सर्दीबसंत  वर्षा ऋतु में फूल मिलते हैंहरियाणापंजाबराजस्थान और उत्तर प्रदेश में बीज जनवरी से मार्च तक एवं जुलाई से सितम्बर में भी बोया जाता है|
उत्तरी एवं दक्षिणी पहाड़ियों में मार्च से अप्रैल में बुआई की जाती हैइसके अलावा सितम्बर में भी बीज बोये जाते हैंबम्बई और मद्रास में सितम्बर के महीने में बीज बोये जाते हैं|
पौधशाला की तैयारी
गेंदे के बीज को पहले पौधशाला में बोया जाता हैक्योंकि बीज छोटे आकार के होते हैंपौधशाला में पर्याप्त मात्रा में गोबर की खा डालकर भली भांति खुदाई कर ली जाती हैक्यारियों में रेत भी डाली जाती हैफिर 15 सेंतुमितर ऊँची उठी क्यारियाँ बनाई जाती हैंबीज को पौधशाला में समान रू से बिखेर कर फिर उन्हें रेत वं पत्ती की खाद के मिश्रण से ढ़ दिया जाता है|
बीज एक सप्ताह के बाद अकुंरित हो जाते हैंऔर पौध 3 से 4 सप्ता बाद रोपाई के लिए तैयार हो जाता हैपौधशाला की नियमित रूप से सिंचाईनलाई इत्यादि समय पर रनी चाहिएताकि पौधों का समुचि विकास हो सके|
उपरोक्त विधियों से आप गेंदा का प्रवर्धन या पौध प्रसारण द्वारा उपयोगी एवं आधुनिक व्यावसायि खेती कर सकते है|